महाभारत
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महाभारत हा भारतात लिहिला गेलेला एक प्राचीन ग्रंथ आहे. महर्षी व्यास या ग्रंथाचे लेखक होत.
महाभारत भारताच्या धार्मिक, तात्त्विक तसेच पौराणिक महाकाव्यांपैकी एक आहे. जागतिक साहित्यातील महत्त्वाचा ग्रंथ असलेल्या महाभारताचा भारतीय संस्कृतीवरचा ठसा अमिट असा आहे.
संपूर्ण महाभारतात एक लाखाहूनही अधिक श्लोक असून हा ग्रंथ ग्रीक महाकाव्ये इलियड व ओडिसी यांच्या एकत्रित आकाराच्याही सात पट मोठा आहे.
अनुक्रमणिका |
[संपादन] इतिहासाचा मागोवा
महाभारत जय नामक ग्रंथाचा विस्तार आहे. या ग्रंथातील घटनांचा काळ सुस्पष्ट नाही. या ग्रंथातील घटना प्रत्यक्ष घडल्या का हा ही एक विवादाचा विषय आहे. काही इतिहासकारांनुसार ग्रंथातील घटना इ.पू. १४०० च्या सुमारास घडल्या. महाभारतात उल्लेख झालेल्या ग्रहणादी खगोलशास्त्रीय घटना विचारात घेतल्या, तरमहाभारताचा काळ सुमारे इ.पू. ३१०० इतका मागे जाऊ शकतो. महाभारताचा विस्तार महर्षी व्यासांचे शिष्य वैशंपायन यांनी केला होता असे इतिहास सांगतो. त्यामुळे महाभारताचा निर्माण काळ साधारण इ.पू.२२०० ते इ.पू.२००० धरण्यास हरकत नाही. महाभारताची सुरुवात अर्जुनाचा ज्येष्ठ नातू जनमेजय याला वैशंपायनांनी दिलेल्या भेटप्रसंगाच्या वर्णनाने झाली आहे.
[संपादन] कथासार
महाभारत हे महाकाव्य असून त्यात कुणाच्याही चरित्राचा विशेष उल्लेख आढळत नाही. ही कथा मुख्यत्वे कौरव आणि पांडव यांच्या साम्राज्यात असलेल्या भारतवर्षाचा उल्लेख आढळतो. कौरव आणि पांडवांमधील कौटुंबिक वैर आणि त्यामुळे त्यांच्यामध्ये झालेले महायुद्ध हा महाभारतातील सर्वांत मोठा विषय आहे.
[संपादन] उपकथा / अंतर्भूत ग्रंथ
महाभारतातील प्रमुख उपकथा /ग्रंथ असे:
- भगवद्गीता (भीष्मपर्व): हिंदू धर्म व तत्त्वज्ञानशाखांत मुख्य समजली जाणारी श्रीमद्भगवद्गीता, ही हिंदूंच्या वैदिक, आध्यात्मिक व यौगिक तत्त्वज्ञान आणि तंत्रशास्त्र या गोष्टींचा संगम आहे. गीतेत भक्ती, ज्ञान, ध्यान व कर्म या चार योगमार्गांचा उपदेश कृष्णाने अर्जुनास केला आहे.
- दमयंती (अरण्यपर्व): नळदमयंतीची कथा महाभारताच्या प्रसिद्ध उपकथांमध्ये एक आहे. स्वयंवरात इंद्र, वरुण यांना डावलून दमयंती नळास वरते.
- कृष्णावतार: कृष्णाची संपूर्ण कथा "कृष्णावतार" पुराणात येते. ही कथा महाभारतातील महत्त्वाचे पात्र असलेल्या कृष्णाच्या लीलांचे वर्णन करते.
- विष्णु सहस्रनाम (अनुशासनपर्व): विष्णुसहस्रनाम विष्णूच्या १,००० नावांचे स्तोत्र आहे. हे महाभारताच्या अनुशासन पर्वाच्या १४९ व्या अध्यायात येते. युद्धानंतर मरणोन्मुखी भीष्मास युधिष्ठिर अनेक धर्मप्रश्न विचारतो तसेच पुण्यसंपादनाचा मार्ग ही विचारतो. भीष्म उत्तर म्हणून विष्णु सहस्रनाम सांगतात.
- रामायणाची कथा महाभारताच्या अरण्यपर्वात संक्षिप्तपणे येते.
[संपादन] तत्वज्ञान
महाभारतातील तत्त्वोपदेश मुख्यत्वे चार ठिकाणी आला आहे.
या खेरीज काही तत्त्ववचिंतक भीष्मोपदेश व विदुरोपदेश यांनाही महाभारतातील तत्त्वचिंतनात स्थान देतात.
[संपादन] महाभारताची पर्वे
| पर्व क्र. | पर्वाचे नाव | उप-पर्व | संक्षिप्त ओळख |
| १ | आदि पर्व | १-१९ | ओळख, राजपुत्रांचा जन्म व शिक्षण |
| २ | सभा पर्व | २०-२८ | राजसभा, द्यूतक्रीडा व पांडव वनवासाला जातात. |
| ३ | अरण्य पर्व | २९-४४ | पांडवांचा बारा वर्षांचा वनवास |
| ४ | विराट पर्व | ४५-४८ | अज्ञातवासाचे विराट नगरीतील वनवासाचे शेवटचे एक वर्ष |
| ५ | उद्योग पर्व | ४९-५९ | युद्धाची तयारी |
| ६ | भीष्म पर्व | ६०-६४ | महायुद्धा पहिला भाग म्हणजेच भीष्म कौरवांचे सेनापती असतानाचे पहिले दहा दिवस |
| ७ | द्रोण पर्व | ६५-७२ | युद्धाचा पुढील भाग जेव्हा द्रोण हे कौरवांचे सेनापती होते |
| ८ | कर्ण पर्व | ७३ | कर्ण कौरवांचा सेनापती असतानाचे युद्धाचे वर्णन |
| ९ | शल्य पर्व | ७४-७७ | युद्धाचा शेवटचा भाग जेव्हा शल्य कौरवांचा सेनापती होते |
| १० | सौप्तिक पर्व | ७८-८० | अश्वत्थामाने रात्रीच्या अंधारात झोपलेल्या(सौप्तिक) पांडवपुत्रांवर पांडव समजून केलेले आक्रमण |
| ११ | स्त्री पर्व | ८१-८५ | गांधारी व इतर स्त्रियांनी मृतांसाठी केलेला शोक |
| १२ | शांति पर्व | ८६-८८ | युधिष्ठिराचा राज्याभिषेक व भीष्मांचा युधिष्ठिराला उपदेश |
| १३ | अनुशासन पर्व | ८९-९० | भीष्मांचा युधिष्ठिराला अखेरचा उपदेश |
| १४ | अश्वमेध पर्व | ९१-९२ | युधिष्ठिराने केलेला अश्वमेध यज्ञ |
| १५ | आश्रमवास पर्व | ९३-९५ | धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर व कुंती यांचे वनाकडे प्रस्थान व वणव्यात मृत्यू |
| १६ | मुसळ पर्व | ९६ | मुसळाचा शस्त्राप्रमाणे वापर करून यादवांचे झालेले गृहयुद्ध (यादवी) |
| १७ | महाप्रस्थान पर्व | ९७ | पांडवांच्या स्वर्गारोहणाचा सुरुवातीचा भाग |
| १८ | स्वर्गारोहण पर्व | ९८ | युधिष्ठिराचा सदेह स्वर्गात प्रवेश |
| खिला | हरिवंश पर्व | ९९-१०० | श्रीकृष्णाचे चरित्र |
[संपादन] महाभारतामधील व्यक्तिरेखा व स्थाने
मेनका, विश्वामित्र ऋषि दुष्यंत, शकुंतला, भरत शंतनू ,गंगा, मत्स्यगंधा/सत्यवती - देवव्रत/भीष्म, चित्रांगद, विचित्रवीर्य भगवान व्यास, पाराशर, पराशर अंबा, अंबिका, अंबालिका पंडू, कुंती, माद्री - युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव. पांडव, (यम, वायू, इंद्र अश्विनीकुमार) धृतराष्ट्र, गांधारी, दुर्योधन, दुःशासन, दुःशीला, दुर्धर, दुर्जय. युयुत्सु विकर्ण. कौरव, शकुनी कृपाचार्य, विदुर द्रोणाचार्य, कृपी - अश्वत्थामा द्रुपद - द्रौपदी, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु विराट - उत्तर, कीचक सुभद्रा - अभिमन्यु उत्तरा - परीक्षित - जनमेजय हिडिंब, बकासुर हिडिंबा - घटोत्कच उलूपी
एकलव्य, कर्ण संजय, सुदामा, सात्यकी
चंद्रवंश ययाती देवयानी शर्मिष्ठा - पुरू यदु यादव शुक्राचार्य कच बृहस्पती उग्रसेन - कंस वसुदेव रोहिणी देवकी -बलराम कृष्ण नंद यशोदा पूतना कालिया नाग राधा रुक्मिणी सत्यभामा जांबवंती भीष्मक रुक्मी सांब प्रद्युम्न अनिरुद्ध जांबवंत
बृहन्नडा सैरंध्री दारूक देवदत्त गांडीव
वसिष्ठ ऋषि अरुंधती धौम्य ऋषि भारद्वाज ऋषि अष्टावक्र दुर्वास ऋषि हनुमान
हस्तिनापुर ऋषिकेश इंद्रप्रस्थ गांधार मगध वृंदावन मथुरा द्वारिका द्वारका
[संपादन] कुरु वंशवृक्ष
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कुरुक |
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सत्यवती |
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पराशर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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व्यास |
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विचित्रवीर्य |
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अंबालिका |
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धृतराष्ट्रग |
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गांधारी |
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शकुनी |
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कुंती |
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पंडु राजाग |
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माद्री |
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कर्णच |
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युधिष्ठिरड |
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भीमड |
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अर्जुनड |
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नकुलड |
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सहदेवड |
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| दुर्योधनत |
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दु:शीला |
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दु:शासन |
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(९८ इतर पुत्र) |
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संकेत सूची:
टीपा
- क: कुरु साम्राज्यापूर्वी कुरुचे शंतनू आदी पूर्वज होते.
- ग: विचित्रवीर्याच्या मरणानंतर व्यासांद्वारे धृतराष्ट्र व पांडुराज जन्मला.
- च: कुंतीस कर्ण हा पुत्र सूर्याच्या वराने विवाहापूर्वी जन्मला.
- ड: पांडव पंडूचे सख्खे पुत्र नव्हेत. ते खालील देवतांचे धर्मपुत्र होत.:
- त: दुर्योधन, इतर ९९ कौरवांचा जन्म एकाचवेळी झाला.
[संपादन] यार्दीकृत संशोधन
पुणे शहरातल्या प्रसिद्ध "भांडारकर प्राच्य विद्या संशोधन मंदिर"ने काही वर्षांपूर्वी काही विद्वानांच्या खूप संशोधनानंतर महाभारताची एक आवृत्ति प्रसिद्ध केली. त्यावेळी, एम. आर. यार्दी यांचा महाभारतासंबंधी एक इंग्रजी ग्रंथही त्या संस्थेने प्रकाशित केला. (रामायण आणि गीता ह्यांविषयीसुद्धा यार्दींनी ग्रंथ लिहिले आहेत.) .यार्दींच्या महाभारतासंबंधी संशोधनातले काही ठळक मुद्दे असे :
सुमारे ३,००० वर्षांपूर्वी उत्तर भारतात जे एक मोठे युद्ध घडले त्याचे त्या युद्धानंतर लवकरच व्यासऋषींनी "जय" नावाच्या ग्रंथात त्याचे वर्णन केले. व्यासांच्या पश्चात सुमारे ५० वर्षांनंतर वैशंपायनऋषींनी "जय"मधले त्या युद्धाचे वर्णन स्वतःची भर घालून "भारत" नावाच्या एका ग्रंथात सादर केले. सुमारे ५०० वर्षांनांतर सुत आणि सौति ह्या पिता-पुत्रांनी "भारता"त भर घालून "महाभारत" तयार केले. त्यानंतर सुमारे २५० वर्षांनी कोणी "हरिवंश"काराने आणि मग १०० वर्षांनी कोणी "पर्वसंग्रह"काराने महाभारतात आणखी भरी घातल्या.
"पर्वसंग्रह"कारर्निर्मित महाभारतात ८१,६७० श्लोक आहेत. त्यांपैकी मूळच्या "जय"मधले श्लोक सुमारे ८,८००; वैशंपायनऋषींनी भर घातलेले सुमारे १२,३६२; सुत आणि सौति पिता-पुत्रांनी प्रत्येकी भर घातलेले १७,२८४ आणि २६,७२८; "हरिवंश"काराने समाविष्ट केलेले ९,०५३; "पर्वसंग्रह"काराने समाविष्ट केलेले १,३६९; आणि "हरिवंश"कारानेच श्रीकृष्णचरित्र कथन करण्याकरता स्वतंत्रपणे घातलेले "हरिवंशा"चे ६,०७४ श्लोक.
महाभारतात गीतेचा अंतर्भाव प्रथम सौतींनी केला. "जय"मधे पहिल्यांदा वर्णिलेले युद्ध घडले त्या काळी लोक श्रीकृष्ण देवाचा अवतार न मानता अर्जुन-भीष्मादींप्रमाणेच एक व्यक्ती मानत असत. श्रीकृष्णही स्वतःला देवाचा अवतार न मानता इतरांप्रमाणे शिव ह्या तत्कालीन दैवताची पूजा करत असत. सौति जन्मले त्या आधीच्या थोड्याशा काळात श्रीकृष्ण हे विष्णूचा काहीसा अवतार असल्याची कल्पना प्रचारात आली होती. श्रीकृष्णाच्या गोकुळातल्या बाललीला आणि गोपींबरोबरची रासक्रीडा इत्यादी कथा "हरिवंश"काराने "हरिवंशा"त प्रथम अंतर्भूत केल्या. (राधेचा उल्लेख महाभारतात किंवा महाभारताला जोडलेल्या "हरिवंशा"तही नाही; तिचा उल्लेख लोककथांमधे पहिल्यांदा सुमारे इसवी सन ९०० च्या सुमाराला झाला.)
वेदान्त व सांख्य तत्वज्ञान, आणि यॊग व भक्तिसाधने ह्यांचा समन्वय घालून श्रीमद्भगवद्गीता रचणार्या सौतींची बौद्धिक झेप नि:संशय असामान्य होती.
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