औरंगजेब
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| औरंगजेब | ||
|---|---|---|
| बादशाह | ||
| औरंगजेब कुराण पठण करताना, इसवी सनाच्या १८ व्या शतकातील अनामिक चित्रकाराने रंगविलेले चित्र | ||
| अधिकारकाळ | १६५९-१७०७ | |
| पूर्ण नाव | अबू मुझफ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर | |
| जन्म | नोव्हेंबर ३, १६१८ | |
| दाहोद, भारत | ||
| मृत्यू | मार्च ३, १७०७ | |
| औरंगाबाद, महाराष्ट्र, भारत | ||
| पूर्वाधिकारी | शाह जहान | |
| उत्तराधिकारी | बहादूर शाह पहिला | |
| पत्नी | रबिया दुर्रानी, दिलरास बानो बेगम | |
| संतती | * बहादूर शाह पहिला, पुत्र
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| राजघराणे | मुघल | |
मुघल साम्राज्याचा शेवटचा मोठा सम्राट
औरंगजेब (1618-1707) भारत का एक मुगल शासक था । वह आख़िरी शक्तिशाली मुगल शासक था और उसने अपने राज्य में शरियत (इस्लामी कानून) लागू किया था । एक गैर-मुसलमान जनता पर ऐसा करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था । उसके शासन का अधिकांश समय दक्षिण तथा अन्य स्थानों पर विद्रोहों को कुचलने में लगा रहा ।
अनुक्रम [छुपाएँ] १ सत्तासन १.१ सत्तासंघर्ष २ शासक औरंगज़ेब २.१ साम्राज्य विस्तार
[संपादित करें] सत्तासन शाहजहाँ ने 1634 में, मुग़ल प्रथाओं के अनुसार, शहज़ादा औरंगज़ेब को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया । औरंगज़ेब किरकी (महाराष्ट्र) को गया जिसका नाम बदलकर उनसे औरंगाबाद कर दिया । 1637 में उसने रबिया दुर्रानी से शादी की । इधर शाहजहाँ मुग़ल दरबार का कामकाज अपने बेटे दारा शिकोह को सौंपने लगा । 1644 में औरंगज़ेब की बहन एक दुर्घटना में जलकर मर गई । औरंगज़ेब इस घटना के तीन हफ्ते बाद आगरा आया जिससे उसके पिता और शाह शाहजहाँ को क्रोध आया । उसने औरंगज़ेब को दक्कन के सूबेदार के ओहदे से बर्ख़ास्त कर दिया । औरंगज़ेब 7 महीनों तक दरबार नहीं आ सका । बाद में शाहजहाँ ने उसे गुजरात का सूबेदार बनाया । औरंगज़ेब ने सुचारू रूप से शासन किया और उसे इसका सिला भी मिला - उसे बदख़्शान (उत्तरी अफ़गानिस्तान) और बाल्ख़ (अफ़गान-उज़्बेक) क्षेत्र का सूबेदार बना दिया गया ।
इसके बाद उसे मुल्तान और सिंध का भी गवर्नर बनाया गया । इस दौरान वो फ़ारस के सफ़वियों से कंधार पर नियंत्रण के लिए लड़ता रहा पर उसे हार के अलावा और कुछ मिला तो वो था - अपने पिता की उपेक्षा । 1652 में उसे दक्कन का सूबेदार फ़िर से बनाया गया । उसने गोलकोंडा और बीजापुर के खिलाफ़ लड़ाइयाँ की और निर्णायक क्षण पर शाहजहाँ ने सेना वापस बुला ली । इससे औरंगज़ेब को बहुत ठेस पहुँची क्योंकि शाहजहाँ ऐसा उसके भाई दारा शिकोह के कहने पर कर रहा था ।
[संपादित करें] सत्तासंघर्ष सन् 1652 में शाहजहा बीमार पड़ा और ऐसा लगने लगा कि शाहजहाँ की मौत आ जाएगी । दारा शिकोह, शाह सुजा और औरंगज़ेब में सत्ता संघर्ष चलने लगा । शाह सुज़ा, जिसने अपने को बंगाल का गवर्नर घोषित करवाया था को हारकर बर्मा के अराकान क्षेत्र जाना पड़ा और 1659 में औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को कैद करने के बाद अपना राज्याभिषेख करवाया । दारा शिकोह को फाँसी दे दी गई । ऐसा कहा जाता है कि शाहजहाँ को मारने के लिए औरंगज़ेब ने दो बार ज़हर भिजवाया । पर जिन हकीमों से उसने ज़हर भिजवाया था वो शाहजहाँ के वफ़ादार थे और शाहजहाँ के विष देने के बज़ाय वे खुद ज़हर पी गए ।
[संपादित करें] शासक औरंगज़ेब मुग़ल, खासकर अकबर के बाद से, गैर-मुस्लिमों पर उदार रहे थे लेकिन औरंगज़ेब उनके ठीक उलट था। औरंगज़ेब ने जज़िया कर फिर से आरंभ करवाया, जिसे अक़बर ने खत्म कर दिया था। उसने कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया। कश्मीरी ब्राह्मणों ने सिक्खों के नौवें गुरु तेगबहादुर से मदद मांगी। तेगबहादुर ने इसका विरोध किया तो औरंगज़ेब ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। इस दिन को सिक्ख आज भी अपने त्यौहारों में याद करते हैं।
[संपादित करें] साम्राज्य विस्तार औरंगज़ेब के शासनभर युद्ध-विद्रोह-दमन-चढ़ाई इत्यादि का तांता लगा रहा । पश्चिम में सिक्खों की संख्या और शक्ति में बढ़ोत्तरी हो रही च् । दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा को अंततः उसने हरा तो दिया पर इस बीच शिवाजी की मराठा सेना ने उनको नाक में दम कर दिया । शिवाजी को औरंगज़ेब ने गिरफ़्तार कर तो लिया पर शिवाजी और सम्भाजी के भाग निकलने पर उसके लिए शदीद फ़िक्र का सबब बन गया । शिवाजी की मृत्यु के बाद भी मराठों ने औरंग़जेब को परेशान किया।
इस बीच हिन्दुओं को इस्लाम में परिवर्तित करने की नीति के कारण राजपूत उसके ख़िलाफ़ हो गए च् और उसके 1707 में मरने के तुरंत बाद उन्होंने विद्रोह कर दिया । शिवाजीराजे सिर्फ राजे नही थे बल्कि लोगोन्के राजा थे